Section 497 of IPC unconstitutional

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Section 497 of IPC unconstitutional

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) 1860 की धारा 497 को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया है जो पुरुषों के लिए जारकर्म या एडल्टरी को दंडनीय अपराध बनाता है. आईपीसी के सेक्‍शन 497 के तहत अगर शादीशुदा पुरुष किसी अन्‍य शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाता है तो यह अपराध है. लेकिन इसमें शादीशुदा महिला के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है.

The Supreme Court has unanimously struck down Section 497 of the Indian Penal Code (IPC) 1860, which makes adultery punishable for men. Under section 497 of the IPC, if a married man makes a relationship with another married woman, then this is a crime. But there is no crime against a married woman.

 
 
इस सेक्‍शन में सबसे जरूरी बात ये है विवाहित महिला का पति भी अपनी पत्‍नी के खिलाफ केस दर्ज नहीं करा सकता है. इस मामले में शिकायतकर्ता विवाहित महिला से संबंध बनाने वाले पुरुष की पत्‍नी ही शिकायत दर्ज करा सकती है.

The most important thing in this section is that the married woman's husband can not even register a case against his wife. The complainant in this case, the wife of a man who has a relationship with a married woman can file a complaint.

 
 

इस कानून के तहत अगर आरोपी पुरुष पर आरोप साबित होते है तो उसे अधिकतम पांच साल की सजा हो सकती है. इस मामले की शिकायत किसी पुलिस स्‍टेशन में नहीं की जाती है बल्कि इसकी शिकायत मजिस्‍ट्रेट से की जाती है और कोर्ट को सबूत पेश किए जाते हैं.

Under this law, if the accused is proved guilty, then he can be punished for a maximum of five years. The complaint is not made in any police station, but the complaint is made to the magistrate and the evidence is presented to the court.

 
 

अब आईपीसी की 158 वर्ष पुरानी धारा 497 असंवैधानिक है और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के लिए गलत है. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा गया कि पति पत्नी का स्वामी नहीं है, या पत्नी पति की संपत्ति नहीं है और दूसरे लिंग पर एक लिंग की कानूनी संप्रभुता गलत है.

Now the 158-year-old Section 497 of the IPC is unconstitutional and is wrong for Article 21 (Right to Life and Personal Freedom) and Article 14 (Right to Equality). The apex court also said that the husband is not the owner of the wife or the wife is not the property of the husband and the legal sovereignty of gender on the other gender is inaccurate.

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