Section 377 ruling and medical interventions

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Section 377 ruling and medical interventions

सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा गुरुवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द करने का फैसला - जो समलैंगिकता को अपराध बनाता है - ने एचआईवी पॉजिटिव रोगियों, स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ताओं और अधिकार कार्यकर्ताओं को भी राहत दी है। यह फैसला मनुष्य की गरिमा को बहाल करता है और एचआईवी पॉजिटिव समलैंगिक व्यक्तियों की बेहतर देखभाल को सक्षम करने की उम्मीद करता है, जो पहले उपचार ना होने, या उपचार होने के बाद उपहास और भेदभाव का सामना करने की दुविधा का सामना कर रहे होते है।

The Supreme Court on Thursday decided to cancel Section 377 of the Indian Penal Code - which commits homosexuality - has also provided relief to HIV positive patients, health care workers and rights activists. This decision restores human dignity and hopes to enable better care of HIV-positive gay people, who are facing dilemma to face ridicule and discrimination after being treated earlier or after treatment.

 

यूएनएड्स के अनुसार, 2016 में भारत में एचआईवी से 2.1 मिलियन और एड्स से संबंधित 62,000 मौतें हुईं। इनमे से केवल आधे ही एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी का उपयोग कर रहे थे। समलैंगिक पुरुष और अन्य पुरुष जो पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाते हैं (एमएसएम) में एचआईवी का प्रसार 4.3% था।

According to UNAIDS, India has 2.1 million HIV and 62,000 AIDS-related deaths in 2016. Only half of them were using anti-retroviral therapy. HIV spread in 4.3% of gay men and other men who have sex with men (MSM).

 

धारा 377 के विघटन से गैर-सरकारी संगठनों और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) के कामगारों को खुलेआम काम करने और किसी अपराध के किए जाने का डर नही होगा। चिकित्सक के लिए यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि व्यक्ति LGBT है या नहीं। पहले कानून के डर से यौन अभिविन्यास का खुलासा नही होता था.

With the dissolution of section 377, the workers of NGOs and National AIDS Control Organization (NACO) will not be afraid to work openly and commit any crime. It is important for the doctor to know whether the person is LGBT or not. Sexual orientation was not revealed before the fear of law.

 

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