Section 377 is irrational

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Section 377 is irrational

सुप्रीम कोर्ट ने एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय के लोगों से अपने "क्रूर" दमन के लिए इतिहास को भुलाने की प्रार्थना के साथ समलैंगिकता को क़ानूनी रूप से वैध ठहराया। संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत एक ही लिंग के वयस्कों के बीच निजी सहमति यौन व्यवहार का अपराधीकरण स्पष्ट रूप से असंवैधानिक है। न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने धारा 377 को “मैकाले की विरासत” कहा, जो कि सांसदों की सुस्ती के कारण उदार संविधान के बावजूद 68 वर्षों तक जारी रही।

The Supreme Court has legalized homosexuality with the LGBTQ (Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, and Queer) community to pray for people to forget history for their "cruel" suppression. The Constitution Bench unanimously said that under section 377 of the Indian Penal Code, private consent between adults of the same sex is criminalization of sexual behavior clearly unconstitutional. Justice D.Y. Chandrachud called Section 377 "the legacy of Macaulay", which continued for 68 years despite the liberal constitution due to the idleness of MPs.

अदालत ने कहा, हालांकि धारा 377 को "अप्राकृतिक" यौन क्रियाओं पर लागू किया जाएगा, जैसे कि जानवर और मनुष्य के बीच में सम्भोग पर। बिना सहमति के यौन कृत्य धारा के तहत अपराध मन जायेगा. यह गरिमा के साथ जीने के अधिकार का मामला था। औपनिवेशिक कानून द्वारा नागरिकों को अस्पष्टता में नहीं धकेला जा सकता है। धारा 377 केवल उनके यौन अभिविन्यास के लिए अल्पसंख्यक के खिलाफ भेदभाव करती है। यह LGBTIQ समुदाय के "समान नागरिकता और कानूनों के समान संरक्षण" के अधिकार का उल्लंघन करता है। अदालत ने माना कि शारीरिक स्वायत्तता व्यक्तिवादी है। साथी की पसंद निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

The court said, though Section 377 will be applied to "unnatural" sexual acts, such as between animal and human intercourse. Crime will be considered under the non-consenting sexual act. It was a matter of the right to live with dignity. Citizens can not be pushed into ambiguity by colonial law. Section 377 only discriminates against a minority for their sexual orientation. This violates the LGBTIQ community's right to "equal citizenship and protection of laws". The court admitted that physical autonomy is individualistic. The partner's choice is part of the fundamental right of privacy.

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