Prevention of Corruption (Amendment) Bill, 2018

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संसद ने सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक (संशोधन) विधेयक 2018 पारित किया है. विधेयक में 'रिश्वत देने' को प्रत्यक्ष अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है. अगर सात दिनों के भीतर रिश्वत देने वाला व्यक्ति कानून प्रवर्तन अधिकारियों को सूचित करता है तो इसे अपराध के रूप में नही माना जायेगा. यह लोक सेवक को रिश्वत देने और वाणिज्यिक संगठन द्वारा रिश्वत देने से संबंधित विशिष्ट प्रावधान करता है

Parliament has passed the Prevention of Corruption (Amendment) Bill, 2018 to increase transparency and accountability of the government. The 'giving bribe' in the bill is defined as a direct crime. If within seven days the person giving the bribe informs the law enforcement authorities it will not be considered as a crime. It provides specific provisions relating to bribery to public servants and bribe by the commercial organization.

आपराधिक कदाचार को पुनर्परिभाषित किया गया है- अवैध संवर्धन (जैसे कि संपत्ति का पता लगाना किसी ज्ञात आय स्रोतों से अनुपातहीन होना) और संपत्ति का धोखाधड़ी से दुरुपयोग.

Criminal misconduct has been redefined - illicit enrichment (such as finding out the property to be disproportionate to any known income sources) and misuse of property fraud.

किसी लोक सेवक द्वारा किए गए अपराध की किसी भी जांच को करने के लिए संबंधित सरकार या सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति लेना अनिवार्य बनाता है. ऐसे मामलों में ऐसी मंजूरी आवश्यक नहीं होगी जिसमें रिश्वत लेने के आरोप में मौके पर व्यक्ति की गिरफ्तारी शामिल हो.

To make any inquiry of the crime done by a public servant, it is mandatory to seek prior approval of the concerned government or competent authority. In such cases, such clearance will not be required, including the arrest of the person on the spot in connection with taking bribe.

ट्रायल की समयावधि दो वर्ष के भीतर निर्धारित की जाती है यदि इसे विशेष न्यायाधीश द्वारा नियंत्रित किया जाता है. देरी के मामले में, प्रत्येक छह माह के विस्तार के बाद कारण बताना जरुरी है. ट्रायल पूरा होने की कुल अवधि चार साल से अधिक नहीं हो सकती है.

The trial period is set within two years if it is controlled by a special judge. In case of delays, it is necessary to give reasons after the expansion of every six months. The total period of completion of the trial can not be more than four years.

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